एम. डब्लू. अंसारी 

1857-पहली जंग-ए-आजादी, उर्दू सहाफत, सहाफियों और मुजाहिदीन आजादी का किरदार...कर सलाम तिरंगे को, जिससे हमारी शान है-हर घर तिरंगा लहराएं, यह हमारी पहचान है।

भोपालः- आप और आपके इदारे कि गिरांकदर खिदमात रोज रोशन की तरह अयां हैं। उर्दू जुबान-व-अदब के फरोग और नई नस्ल तक जुबान की तरसील को लेकर मध्य प्रदेश बिल्खुसूस भोपाल के सहाफियों, उदबा ने जो एकदामात उठाये हैं वह अहमियत के हामिल हैं। हम सभी जानते हैं कि उर्दू एक जिंदा व तवाना जुबान है। भारत में पैदा होने वाली यह जुबान अब सिर्फ भारत की सरहद तक कैद नहीं है बल्कि दुनिया की मजबूत और ताकतवर जुबान के तौर पर उर्दू का नाम लिया जाता है। भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, सभी मुस्लिम बिल्खुसूस गल्फ (खलीजी मुमालिक) समेत यूरोपियन मुमालिक जैसे रसिया, अमेरिका वगैरह में भी इस जुबान के चर्चे आम हैं। उर्दू दुनिया की सातवीं मकबूल जुबान बन गई है। हाल ही में यू.एन.ओ ने भी अरेबिक, चाइनीस, इंग्लिश, फ्रेंच, रशियन, स्पेनिश की तरह उर्दू, हिंदी और बांग्ला को भी इंटरनेशनल जुबान करार दे दिया है और यू.एन.ओ ने उर्दू जुबान को अपनी दफ्तरी जुबान में शामिल किया है।

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      मुल्क की तहजीब-व-सकाफत, जमहूरी एकदार की बहाली, गंगा जमुनी तहजीब को फरोग देने में इस जुबान ने कुलीदी किरदार अदा किया है। उर्दू जुबान, शेर-व-अदब के शाना बशाना उर्दू सहाफत ने मुल्क की यहजहती, सलामती, अवामी बेदारी और तहरीक आजादी में जो किरदार पेश किया है वह ना सिर्फ बे-मिस्ल है बलकि अगर यह कहा जाए कि उर्दू सहाफत की रोशन तारीख के जिक्र के बगैर भारत की तहरीके आजादी की तारीख ना मुकम्मल है तो गलत नहीं होगा। जिस तरह से मुल्क की आजादी हमारी साझी विरासत का हिस्सा है इसी तरह से उर्दू सहाफत की रोशन तारीख भी हमारी साझी विरासत का हिस्सा है।

      साल 2022 उर्दू सहाफत के हवाले से एक संग-ए-मेल का साल है। 27 मार्च 2022 में उर्दू सहाफत के 200 साल मुकम्मल हो गए। उर्दू सहाफत ने अपने 200 साला सफर में मुल्क में संग-ए-मेल का किरदार अदा किया है। उर्दू सहाफत कल भी अहमियत की हामिल थी और आज भी उर्दू सहाफत अपनी बा मकसद सहाफत के लिए आलमी सतह पर जानी पहचानी जाती है।

      उर्दू का पहला अखबार ष्जामे जहांनुमाष् 1822 में कोलकाता से शाए किया गया था। जामे जहांनुमा के नाशिर हरिदत्त और एडिटर सदा सुखलाल थे। इसके बाद कई एक उर्दू अखबार जिसमें 1849 में इंदौर से ष्मालवा अखबारष् धर्म नारायण जैसे हम अखबार जारी हुए। ष्जामे जहांनुमाष् और ष्मालवा अखबारष् की इशाअत के बाद कोलकाता, दिल्ली, आगरा, ग्वालियर और दूसरे शहरों से बड़ी तादाद में उर्दू अखबारात शाए हुए हैं और उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ भारत वासियों में जोश-व-वल-वाला भरने में अहम किरदार अदा किया। 1857 की तहरीक-ए-आजादी जिसे अंग्रेजों ने गदर का नाम दिया था। जिसको हम जद्दोजहद आजादी की पहली जंग के नाम से जानते हैं और दुनिया के तमाम तारीख दां भारत की पहली जंग-ए-आजादी मानते हैं। इसके खिलाफ उर्दू अखबार बिल्खुसूस मौलवी मोहम्मद बाकिर के ष्देहली उर्दू अखबारष् में अंग्रेजों के जुल्मों सितम के खिलाफ जो तहरीरें शाए होती थीं उसने अंग्रेजी हुकूमत की चौलें हिला कर रख दी थीं, जिसके नतीजे में मौलवी मोहम्मद बाकिर को 16 सितंबर 1857 को तोप के गोले से शहीद कर दिया गया था। इस तरह से उर्दू के पहले सहाफी ने जामे शहादत नोश किया। मौलवी मोहम्मद बाकर का तअल्लुक किले से था और किले वालों में मोहतरम भी थे। ग़ालिब, मोमिन, जौक व शेफता भी इस अखबार के कद्रदान में थे।
      पूरे भारत में आजादी का अमृत महोत्सव मनाया जा रहा है। इस सिलसिले में बे-नजीर अंसार एजुकेशनल एंड सोशल वेलफेयर सोसाइटी अपील करती है कि स्कूलों, कॉलेजों, यूनिवर्सिटीयों में इस मौके पर तक तकारीब का एनेकाद कर बच्चों को मुजाहिद आजादी बिल्खुसूस उर्दू सहाफी की खिदमात और वतन पर मर मिटने के उनके जज्बात को याद किया जाए। इसके साथ-साथ उनकी हयात-व-खिदमा (जीवनी) पर भी रोशनी डाली जाए। आजादी के 75 साल मुकम्मल होने के मौके पर अपने इदारे के जेरे एहतमाम सेमिनार, जलसा, समपोजियम का इनेकाद करें और मुजाहिदीन-ए-आजादी के बारे में मुक्तसर रिसाले, पंपलेट छपवा कर बच्चों में तकसीम करें, मुजाहिदने आजादी की हयातो खिदमात के मौजू पर इनामी मुकाबलों का इनेकाद करें ताकि बच्चों के दिलों में आजादी की अहमियत, वतन से मोहब्बत और मुजाहिदीने आजादी की इकदार को पहचानने और भारत की जंगे आजादी की रोशन तारीख से नई नस्ल को वाकिफ कराया जा सके।

इस मौके पर बिलखुसूस इन कामों को करना मुतवक्को है, किया जा सकता हैः-

1.   उर्दू जबान की अहमियत पर मुकाबला जाती प्रोग्राम।

2. 1857 की पहली जंग-ए-आजादी में उर्दू सहाफत, उर्दू सहाफियों और मुजाहिदने आजादी का किरदार पर तारीखी मालूमात के मुकाबले।

3. ऐसे तमाम सहाफी, जिन्होंने कलम की ताकत और सहिाफत के जरिए भारत के आम शहरियों को जगाने का काम किया और उसकी वजह से अंग्रेजी हुकूमत के जुल्म-व- ज्यादती के शिकार हुए और कैदो-बंद की सजाएं काटीं।

4. उर्दू जुबान-व-सहाफत ने भारत को एक धागे में बांधने और अमन शांति को बहाल करने में जो कुलेदी किरदार अदा किया उसके बारे में आने वाली नस्लों को बताना चाहिए।

5. सूबे के तमाम यूनिवर्सिटी और कॉलेजों में उर्दू डिपार्टमेंट को खोलने के लिए सरकार से रूजू करना और साथ ही साथ उर्दू पढ़ने-पढ़ाने के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर यानी बुनियादी ढांचे तैयार किया जाए। जिसके जरिए तलबा को उर्दू पढ़ने-पढ़ाने पर जोर दिया जाए।

6. न्यू एजुकेशन पॉलिसी के तहत जुबान के फरोग के इमकानात ज्यादा हैं। उर्दू की तदरीस व तरवीज के लिए इसको अपनाया जाए। और इसके लिए मरकजी और सूबाई सरकारों से रुजू किया जाए।

7. उर्दू सहाफत ष्उर्दू जर्नलिज्म एंड मास कम्युनिकेशनष् का कोर्स खोलने के लिए सभी कॉलेजों और यूनिवर्सिटियों से राब्ता किया जा सकता है। उर्दू सहाफत के लिए आने वाली नस्लों की जिहन साजी करना और दीगर कोर्सेज के साथ-साथ इसकी अहमियत को बताया जाना चाहिए।

8. उर्दू लाइब्रेरी खोले जाने पर और तमाम साइंस टेक्नोलॉजी/बायोलॉजी वगैरह की किताबों को उर्दू में दस्तियाब कराने के हवाले से सई करनी चाहिए, नई तालिमी पॉलिसी के तहत, जिसकी आज सख्त जरूरत है।

9. कॉलेजों और यूनिवर्सिटियों में उर्दू डिपार्टमेंट खोला जाए। इसके लिए हर स्तर पर आवाज बुलंद किया जाए और जोर दिया जाए। ताकि डिपार्टमेंट खोले जाने के साथ-साथ टीचर्स, लेक्चरर की तकररुरी भी साथ-साथ हो सके।

10. उर्दू जबानों सहाफत ने जंगे आजादी और आजादी के बाद अमन-अमान और तरक्की के लिए निहायत ही कुलीदी किरदार अदा किया है। आज भी उर्दू जुबानो सहाफत के जरिए भारत में फिरका वाराना हम आहंगी, भाईचारा कायम किया जा सकता है। इसलिए इस जुबान (उर्दू) के फराग के लिए तमाम मोअसर इकदामात करने की जरूरत है।

नोटः- उर्दू सहाफत और सहाफियों, जिन्होंने जंगे आजादी में बेश-बहा खिदमात अंजाम दीं उनके हवाले से लिखे गए मजामीन को हमें अरसाल करने (भेजने) की जहमत करें, जिससे आपके मजामीन को मुरत्तब करके किताब या रिसाले की शक्ल दी जा सके। शुक्रिया।
 

04-Aug-2022

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