छत्तीसगढ़ के सनातनी फिल्मी कलाकारों के बहाने ?

राजकुमार सोनी

आज सुबह-सुबह अखबार में एक खबर पढ़ने को मिली कि छत्तीसगढ़ की फिल्मों में काम करने  वाली एक अभिनेत्री ने बढ़िया ऑफर पाकर आम आदमी पार्टी ज्वाइन कर लिया है. अभिनेत्री की शायद मैंने एकाध फिल्म देखी होगी. कौन सी फिल्म बहुत ठीक-ठीक याद नहीं. अभिनेत्री का छत्तीसगढ़ में कोई बड़ा जनाधार होगा यह भी नहीं जानता.

बस...मेरी सुई ऑफर शब्द पर जाकर अटक गई. मैं सोचने लग गया कि आम आदमी पार्टी वालों ने अभिनेत्री को कैसा और कितना ऑफर  दिया होगा ? और क्यों दिया होगा ? अभिनेत्री को कांग्रेस और भाजपा वालों की तरफ से ऑफर क्यों नहीं भेजा गया ? अभिनेत्री एक राजनीतिक दल को ज्वाइन करने के लिए किसी ऑफर का इंतजार क्यों कर रही थीं ? अगर अभिनेत्री राजनीतिक रुप से चेतना संपन्न थीं तो उसने आम आदमी पार्टी के कौन से और किस तरह के काम से प्रभावित होकर पार्टी को ज्वाइन करना आवश्यक समझा ? 

यह कुछ ऐसे सवाल हैं जो छत्तीसगढ़ के परिप्रेक्ष्य में खदबदाने चाहिए थे तो खदबदा रहे हैं. निजी तौर पर मैं मानता हूं कि छत्तीसगढ़ के किसी भी फिल्मी कलाकार की अपनी कोई जनतांत्रिक और राजनीतिक प्रतिबद्धता नहीं है.

( देश के बहुत से हिस्सों में भी यहीं आलम हो सकता है. )

साहित्य, कला, संस्कृति अथवा राजनीति के क्षेत्र में जो कोई भी प्रतिबद्ध नहीं होता है उसे अवसरवादी समझा जाता है. सीधे शब्दों में कहूं तो छत्तीसगढ़ के ज्यादातर फिल्मी कलाकार पैकेज आधारित प्रतिबद्धता के लिए ही काम करते हुए नजर आते रहे हैं.

यह सवाल उठ सकता है कि मैं छत्तीसगढ़ के फिल्मी कलाकारों से बलराज साहनी या कैफी आजमी बन जाने की उम्मीद क्यों पाल रहा हूं ? 

क्या किसी भी कलाकार को प्रतिबद्ध रहना चाहिए ? क्या एक कलाकार को केवल वामपंथी सोच के फिल्म मेकर की फिल्म में ही काम करना चाहिए या फिर उसे घोर दक्षिणपंथी फिल्म में काम करते हुए लोगों के जीवन में जहर भरते रहना चाहिए ? ( जैसा कि इन दिनों अनुपम खेर कर रहे हैं. )

क्या एक सही कलाकार देश को धर्म-जाति के आधार पर बांटने-छांटने और काटने वालों का समर्थक हो सकता है ? क्या एक सच्चे कलाकार को सांप्रदायिक ताकतों का साथ देना चाहिए ? क्या एक कलाकार की सोच सांप्रदायिक होनी चाहिए ?

इस देश में एक नहीं दस तरह की विचारधारा हैं और आगे रहने वाली हैं... लेकिन एक कलाकार को क्या सिर्फ़ हिन्दू दर्शकों के लिए अभिनय करना चाहिए ? उन दर्शकों का क्या दोष जो शोषित हैं. पीड़ित हैं और हिन्दू नहीं है...मगर कलाकार के प्रशंसक हैं...तब क्या कलाकार को अपने ऐसे तमाम प्रशंसकों को इसलिए खारिज कर देना चाहिए कि वे सनातनी नहीं हैं ?

एक अभिनेता इंसान होने के पहले सनातनी कैसे हो सकता है ? 

छतीसगढ़ के बहुत से कलाकार मेरी मित्र सूची में शामिल है. एक फिल्म अभिनेता से कभी-कभार बातचीत भी हो जाती थीं और संदेशों का आदान-प्रदान भी. हाल के दौर के मौजूदा तनाव के बीच एक रोज़ अभिनेता ने बताया कि वह पूरी तरह से सनातनी हैं और एक कौम विशेष को जरा भी पसंद नहीं करता है. मैंने उस अभिनेता को इंसान और इंसानियत का अर्थ समझाने की बहुत कोशिश की, लेकिन मैं उसकी जड़ बुद्धि को दुरस्त नहीं कर पाया. इस अभिनेता के हिस्से में दो-चार हिट फिल्में जुड़ी हैं. अपनी इसी लोकप्रियता का भुनाते हुए अभिनेता ने महासमुंद इलाके से भाजपा की टिकट पर चुनाव लड़ने की इच्छा जताई थीं, लेकिन इस सनातनी अभिनेता को भाजपा वालों ने टिकट देना मुनासिब नहीं समझा. एक अभिनेता और हैं जो अजीत जोगी के शासनकाल में यूथ कांग्रेस से जुड़ गए थे. लेकिन जैसे ही डाक्टर रमन सिंह की सरकार आई तो उनके बेटे के करीबी हो गए. इस अभिनेता की अमूमन हर फिल्म इन दिनों फ्लाप हो रही है सो फिल्म लाइन से जुड़े बहुत से लोग इन्हें कुमार गौरव का पॉकेट एडिशन भी कहते हैं. इस गौरव कुमार ने भी भाटापारा से भाजपा की टिकट पाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाया था, लेकिन यह सनातनी अभिनेता भी असफल हो गया. छत्तीसगढ़ में खुद को सुपर खलनायक के तौर पर प्रचारित करने वाला एक अभिनेता और है. यह अभिनेता भी भाजपा प्रत्याशियों के प्रचार-प्रसार के लिए गांव-गांव जाया करता था. इन दिनों इसका सुर बदला हुआ है और पिछले कुछ समय से मोबाइल की दुकान चला रहा है.

मुझे अब भी लगता है कि देश में हिन्दू-मुस्लिम के नाम पर जो कुछ भी घट रहा है उसे लेकर कलाकार बिरादरी ही सार्थक संदेश दे सकती हैं. कलाकार ही बता सकते हैं कि विविध भाषा-भाषी वाले इस देश में मोहब्बत की चादर को ओढ़ना-बिछाना क्यों अनिवार्य हैं ?

इंडियन पीपुल्स थियेटर से जुड़े कलाकारों की बात छोड़ दूं तो छत्तीसगढ़ के ज्यादातर कलाकार या तो इधर-उधर हो गए हैं या फिर धार्मिक जुलूस में सेल्फी लेते हुए दिखाई देते हैं. एक समय था जब कलाकार मोहब्बत का पैगाम बांटने के लिए सड़कों पर  निकल आते थे. रायपुर- भिलाई के बहुत से रंगकर्मी और फिल्म में काम करने वाले कलाकर देश की लुटिया डूबा देने वाले फेंकूचंद के परम भक्त हैं यह देखकर ही आश्चर्य होता है.

एक सच्चा संस्कृतिकर्मी भाजपा का समर्थक और फेंकूचंद का भक्त कैसे हो सकता है ? थोड़ी तो शर्म कर लो भाई ? यदि संस्कार भारती के संस्कार से ही जीवन को आगे बढ़ाना है तो फिर थियेटर और फिल्म में काम क्यों कर रहे हो? यह जगह मोहब्बत करने वालों के लिए आरक्षित है. इस जगह में पंड़ित का भी उतना ही सम्मान मिलना है जितना एक मुल्ले को मिलना है. यहां तुमको पग-पग में के आसिफ, मेहबूब खान, मोहम्मद रफी, नौशाद, श्मशाद बेगम, बड़े गुलाम अली खान, राजा मेंहदी, दिलीप कुमार ( युसूफ खान ), सायरा बानो,सलीम-जावेद, शाहरूख, सलमान और आमिर खान... सब मिलेंगे. जितना खोजोगे उतना मिलेंगे. यह फील्ड विभाजनकारियों के लिए कभी बनी ही नहीं थीं.

घनघोर किस्म की निराशा के बावजूद छत्तीसगढ़ के बहुत से कलाकार अब भी जनता के नाटक और जनता की फिल्म का मतलब समझते हैं. वे इस बात को अच्छी तरह से जानते हैं कि जाणता राजा जैसा नाटक भव्य होते हुए भी जनता का नाटक नहीं है. और दो-ढ़ाई सौ करोड़ कमाने लेने के बाद भी कश्मीर फाइल्स जैसी फिल्म जनता की फिल्म नहीं हैं.

तो भइया...छत्तीसगढ़ के सनातनी फिल्मी कलाकारों.

पैकेज आधारित प्रतिबद्धता के लिए काम करना आपकी जरूरत हो सकती है, लेकिन भाई-चारे और इंसानियत के लिए काम करना समय की जरूरत हैं. अगर आपका थोड़ा-बहुत भी जनाधार है तो इस कठिन समय को पहचानिए. खुद को भक्त और सनातनी होने से बचाइए. किसी भी ऐसे दल के साथ अपने को संबंद्ध मत करिए जहां हर दूसरे रोज बेगुनाहों का कत्ल करने का फरमान जारी होता हैं. इंसान बने रहेंगे तो अच्छे कलाकार भी बने रहेंगे. सबको पंसद आएंगे. सबकी तालियां और सीटियां मिलेगी. 

दक्षिण भारत के फिल्मी कलाकार अपनी तमाम तरह की धार्मिकता के बावजूद कठिन समय में मुखरित होते हैं इसलिए उनकी आवाज का कोई मतलब भी होता है. उनकी हुंकार पर तालियां भी बजती है...सीटियां भी.कभी-कभी तो उनके इशारे भर से तख्ता भी पलट जाता है.

19-Apr-2022

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