क़ादिर रज़वी

वेक्सीनेसन के दौरान राज्य सरकार ने फैसला लेते हुवे स्कूल तो खोल दी है लेकिन सरकार के इस फैसले को लेकर अभिभावकों की चिंता बढ़ गयी है। सरकार के फैसले को सही नहीं बताते हुए छत्तीसगढ़ पालक संग ने कोर्ट की शरण ले ली है।

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        11 महीने बाद छत्तीसगढ़ के स्कूलों में बच्चों की हाजरी लगने लगी है सरकार के मंजूरी के बाद 9 वीं से  12 वीं के स्कूल 15 फरवरी से खोल दिये गए लेकिन स्कूल खोलने का विरोध भी शुरू हो गया है। स्कूल खोले जाने के खिलाफ हाई कोर्ट में छात्र पालक संघ ने याचिका लगाई है और सरकार के फैसले को चुनौती दी है।

           याचिका में कहा- गया है कि शासन का फैसला गलत है क्योंकि अभी कोरोना खत्म नही हुवा है स्कूल खुलने से बच्चे एक दूसरे के संपर्क में आएंगे इससे शोसल डिस्टेंसिंग तो टूटेगी ही जिससे कोरोना होने का खतरा बढ़ जाएगा।

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            शिक्षा के द्वारा आनन फानन में स्कूल खोले जाने का फैसला बेहद आपत्ति जनक अभिभावकों ने माना है।
             स्कूल में न तो सेनेटाइजर की व्यवस्था है न स्कूल जाते बच्चे शोसल डिस्टेंस का पालन कर पा रहे है न ही मास्क का उपयोग हो रहा है न ही वेक्सीनेसन हुवा है। स्कूल में शिक्षक तक मास्क नही लगा रहे तो बच्चों को क्या बोल पाएंगे।

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                  हमारे स्वास्थ्य मंत्री ने ये भी कह दिया है कि हमारे यहाँ बच्चो को किसी को टिका लगने नही देंगे फिर इतनी हड़बड़ी क्या थी स्कूल खोलने की जब 11 महीने की ऑनलाइन क्लासेस ले ली है, 1 महीने की क्लासेस बची हुई है तो उसके लिए बच्चों को स्कूल क्यों बुलाया जा रहा है।
       मार्च से ही बंद प्रदेश के स्कूल खोलने को लेकर सरकार ने हरी झंडी तो दिखा दी लेकिन महामारी को देखते हुवे कुछ गाइड लाइन भी तय की।

क्या है गाइड लाइन-

1-गाइड लाइन के मुताबिक स्कूल प्रबंध को अपने अपने परिसर में सेनेटाइजर कराना जरूरी है।
2-हर छात्रों का टेम्प्रेचर देखना होगा।
3-स्कूल परिसर में शिक्षकों और बच्चों को मास्क पहनना और सेनेटाइजर लगाना जरूरी है।
4-छात्रों को कक्षाओ में शोसल डिस्टेंसिंग का ध्यान रखते हुवे बैठना होगा।
5-कैम्पस में भी बच्चे एक दूसरे के करीब न रहे।
6-एक कमरे में 20 से 22 बच्चे को बैठने की अनुमति दी गयी है।
           ये खयाल स्कूल प्रबंधक को रखना अनिवार्य है।

     सभी जिला शिक्षा अधिकारी खुद स्कुलो का भ्रमण करें तो पता चल जाएगा कि कितने गाइड लाइन का पालन हो रहा है।

                           फिलहाल प्रदेश में  पहली से 8 वीं तक के स्कूल नही खोले गए है सिर्फ 9 वी से 12वी तक स्कूल खोले गए सायद सरकार ये समझती है वो इतने तो समझदार है कि वो नियमो का पालन करते हुवे खुद को संक्रमण से बच सकते है लेकिन ऐसा लगता है पालक संघ सरकार के इस फैसले से सहमत नही बरहाल पालक संघ का डर अपने जगह लाज़मी है।

              लेकिन सवाल ये है कि इस महामारी के आड़ में हम बच्चों को शिक्षा से दूर क्या रखेंगे ।
भले ही वेक्सीनेसन शुरू हो गया हो पर सभी को वेक्सीन लगने में काफी वक्त लगेगा ऐसे में कोरोना अभि जाने वाला नही है और ईसके साथ ही जीना सीखना पड़ेगा।

           लेकिन स्कूल के लिए जो गाइड लाइंस बनाई गई है दरअसल ये गाइड लाइंस आम जिंदगी में अपने घर के बाहर के लिए भी बनी हुई है।

      लेकिन जरा गौर कीजिए इन गाइड लाइन का पालन करते सड़को पर कितने लोग नज़र आते है अब सड़को पर जरा निकल कर देखिये  कितने लोग पर मास्क दिखता है कहाँ- कहाँ सेनेटाइजर का इस्तेमाल होते दिखता है और कहां पर शोसल डिस्टेंसिंग नज़र आती है दरअसल इन तमाम गाइड लाइन की धज्जियां सड़को से लेकर दुकानों पर उड़ रही है।

           ऐसे में सवाल ये उठता है स्कूल भी इसी श्रेणी में लाकर खड़े कर दिए जाएंगे और नियमित कक्षाएं लगेगी तो इन गाइड लाइंस का ऐसा ही हाल नही होगा........???
         जो बाहर सड़को पर नज़र आता है जहां बड़े व्यक्ति गाइड लाइंस का पालन करते नज़र नही आ रहे है वहाँ बच्चो से सरकार कैसे उम्मीद लगाए बैठी है।
          अभी कुछ दिनों पहले कोंडागांव में मोहल्ला क्लास शुरू कराई थी राज्य शासन ने वह 22 बच्चे और 3 शिक्षक कोरोना संक्रमित हुवे थे
   अभी रोज ही समाचार कोरोना पाज़ीटिव होने का आ रहा है मनेन्द्रगढ़ तो सूरजपुर, सैनिक स्कूल अम्बिकापुर और रोज कही न कही से उसके बाद भी सरकार की अनदेखी करना क्या दर्शाता है और क्या समझ जाएं..??

         इसका मतलब शिक्षा माफिया और राज्य शासन की आपसी मिली भगत है आप ये सोचिये 11 महीने ऑनलाइन करवाई जा चुकी है उसके बाद ये अचानक से 1 महीने के लिए स्कूल खोलना पूरी तरह से आपत्ति जनक है हर अभिभावक इसे शर्मनाक कह रहे है।

             पहले exam से 15 दिन पहले कक्षाओ को बंद कर दिया जाता था ताकि बच्चे घर मे exam की तैयारी कर सके यहाँ पर उल्टा ही हो रहा है 1 महीने बचे हुवे है तो सरकार स्कूल खोल दी गयी है।

          जो सीधे तौर पे अभिभावक फीस नही दे पा रहे है क्योंकि कोरोना काल मे सभी प्रतिष्ठानों को बंद करवाया गया तो सरकार से कोई मुवावजा तो नही मांगा न कोई आंदोलन किया गया तो सरकार को समझनी चाहिए कि स्कुलो में मांगी जा रही फिसों को कैसे पालक दे पाएंगे इस महामारी के दौरान पालको ने अपने सेविंग से बच्चों का पालन पोषण किया अब स्कुलो का फीस का बोझ कैसे उठा पाएंगे।

                ये शिक्षा माफियाओ और राज्य शासन की मिली भगत है ताकि इसकी आड़ में पालको अभिभावकों को लूटा जा सके।
ये स्कुलो को खोलना ही पूरा मामला प्राइवेट स्कूलों को फीस दिलवाने के पूरा खेल है। क्या ऑनलाइन क्लास के लिए स्कूल वाले मोबाइल, लेपटॉप दिए बच्चो को जो पैसा वसूला करना चाहते है एक थर्ड क्लास ऑनलाइन क्लास बच्चो को दी गयी है वाट्सऐप में बच्चों को फोटो भेज-भेज के वीडियो भेज-भेज कर पढ़ाई क्या इस तरह ऑनलाइन पढ़ाई होती है इसके एवज में जो फीस मांगी जा रही है स्कूल संचालक द्वारा पालक से क्या उचित है इसलिए अब कुछ जगहों से अभिभावक न्यायलय की शरण मे जाना मजबूरी बनी।

           जबकि प्राइवेट स्कूलो द्वारा शिक्षकों को ऑनलाइन क्लास के लिए  एंगेज रखा औऱ शिक्षकों से 1 से 2 घंटे क्लास दिलवाई गई और उसके एवज में प्राइवेट स्कूल वाले शिक्षकों को वेतन के आधे से कम सेलरी देकर छल किया है लेकिन अब स्कूल संचालक पालक से पूरा-पूरा फीस वसूल करना कहाँ तक सही है।

            जबकि बच्चे स्कूल से प्रांगण में कदम तक नहीं रखे है न स्कूल का बिजली उपयोग हुवा न स्कूल के बच्चों ने स्कूल प्ले ग्राउंड  का उपयोग किया न कमरे का उपयोग किया न स्कूल की लाइब्रेरी उपयोग किया किसी तरह से बच्चों ने स्कूल का उपयोग हि नही किया लेकिन टिविसन फीस की आड़ में समस्त फीस को समायोजित करके स्कूल द्वारा वसूला जा रहा है।

                 ये राज्य शासन भी अच्छी तरह से जानती है लेकिन राज्य शासन पता नही क्यों मुखदर्शक बनी हुई है और शिक्षकों के वेतन की बात है तो पालक संघ ने राज्य शासन को पत्र लिख कर कहा है कि अगर पालक संघो से 30% वसूल की जाए तो शिक्षकों को 100% में 100% शिक्षकों को सेलरी दी जा सकती है.

और वैसे भी "शिक्षा नो प्रोफिट नो लॉस " पर मान्यता दी जाती है न कि शिक्षा का धंधा करने के लिए।

             माननीय न्ययालय के समक्ष जो स्कूल संचालकों ने अपना पक्ष रखा औऱ ये कहा हम शिक्षकों को वेतन नही दे पा रहे है माननीय न्यायालय ने उन्हें टिविसन फीस वसूलने के लिए कहा लेकिन सरकार की जिम्मेदारी थी कि न्ययालय के समक्ष ये बात रखनी चाहिए थी कि स्कूल संचालको टिविसन फीस के आड़ में समस्त शुल्क को वसूल रहे है तो सायद माननीय न्ययालय जो है राज्य शासन को आदेशित करता कि सबसे पहले टिविसन फीस को डिफाइन करवाये उसके बाद टिविसन फीस वसुलिये तो कही न कही माननीय न्यायालय के सामने तथ्य राज्य शासन के द्वारा रखें जाने थे। क्योंकि राज्य शासन एक पक्ष था तो उन्हें अपना पक्ष  पालको का पक्ष बहुत ही कमजोर तरीके से रखा तो निश्चित तौर पे राज्य शासन में बैठे हुवे लोग और शिक्षा माफियाओ की मिली भगत को उजागर करती है। क्योंकि राज्य शासन ने किसी तरह की टिविसन फीस को डिफाइन नही किया।
           लेकिन मुद्दा अभी भी यही है कि अगर स्कूल खोले गए है सरकार आदेश दे दी है फैसला अभी भी पालको के हाथ हो सकता है क्योंकि बच्चा हमारा है और हमे इसबात का डर है कि बच्चा कोरोना संक्रमित हो सकता है।

              दरअसल ये चिन्ता स्वभाविक है बच्चे को पालक किसी ऐसे ख़तरे में नही डालना चाहेगा जो खतरा अदृश्य हो कहाँ से आएगा किस रूप में आएगा इसका भी पता नही है।

             सरकारी स्कूलों की स्थति आपको बतादू सरकार की नज़र में बच्चे भेड़ बकरी है वो जी जाए मर जाए इससे सरकार को कोई लेना देना नही।
            लेकिन प्राइवेट स्कूलों के पेरेंट्स है वो अपने बच्चों के लिए बहुत सतर्क नज़र आ रहे है।

              आपको किसी भी स्कूल के कंसेंट लेटर में (साइन) हस्ताक्षर न करें सरकार की इतना घटिया सोच कैसे हो सकती है हमारे बच्चों को स्कूल भेजना है और सरकार कहती है कि आप लिख के दीजिये की आपका बच्चा स्कूल में कोरोना पाजेटिव हो कर मर जाता है तो उसके लिए पालक जिम्मेदार होंगे मतलब पालक का अपने बच्चे के डेथ सर्टिफिकेट में साइन करने जैसा है क्या ये एक प्रकार कि मूर्खता पूर्वक आदेश नही है .....??

            न स्कूल न सरकार किसी भी प्रकार कि जिम्मेदारी लेने को तैयार नही, तो पालक को ही समझना होगा।              
            अगर आपका बच्चा कोरोना संक्रमित होकर मर जाता है तो समझ लीजिए आपका बच्चा वापस नही आएगा।

           सरकार जो 11 महीने की ऑनलाइन पढ़ाई कराई है और 1 महीना जो बचा हुवा है इसमें सरकार चाहती तो ऑनलाइन Exam करा सकती थी सारे बच्चे घर मे बैठकर शांतिपूर्वक Exam दे सकते थे और आगे की तैयारी कर सकते थे और सरकार नए सत्र स्कूल को जून-जुलाई में खोल सकती थी लेकिन सीधे तौर पर सरकार और शिक्षा माफियाओ की मिली भगत बच्चो की जान लेने पर अड़ी है।

           अंत मे एक बात बताता चलु माननीय न्यायलय सुप्रीम कोर्ट का ये भी आडर है स्कूल फीस ले सकता है लेकिन कोर्ट ने ये भी खास तौर पर कहा है की जो बच्चे स्कुल फीस नही देने की वजह से परीक्षा में स्कूल संचालक न रोक सकता है न ही स्कूल से निकाल सकता है यानी कि स्कूल ऐसा करता है तो संबंधित थाने में जाकर पालक पंजीबद्ध करा सकता है। 

25-Feb-2021

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