मुसलमानों का मसीहा कौन ?
एम.एच. जकारिया  
हमारे देश की विडम्बना ही कही जाएगी  हर जाती धर्म को अपनी बात करने का पूरा अधिकार है लेकिन जब मुसलमान अपने हक़ और अधिकार की बात करता है तो उसे गद्दार और देश द्रोही कहा जाता है.
बिहार चुनाव के बाद स्थिति स्पष्ट होती जा रही है, जहां महाराष्ट्र में कट्टर हिन्दू विचारधारा रखने वाले संगठन शिव सेना को कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस समर्थन दे सकती है लेकिन असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM से ना समर्थ  लेना चाहती है और ना देना इसी लिए बिहार मे NDA महागठबंधन सरकार बनाने से चूक गई? इसे कौन सी  (धर्म निरपेक्षता )सेक्यूरिलजम कहेंगे आज़ादी के बटवारे के बाद से ही देश का मुस्लिम समुदाय अपना नेतृत्व तलाश करने में लगा हुआ  है, 2014 के बाद मुसलमान अपने आप को  सेक्यौरिलज्म के नाम आशहाय और बहुत हद तक ठगा हुआ महसूस करने लगा है ,क्योकि जिन पर विश्वास कर वोट दिया उन्हीं लोगो ने उनका शोसन किया वोट लेते रहे वोट बैंक समझते रहे, इसके लिए बहुत हद तक अशिक्षा  और गरीबी इसका बड़ा मूल  कारण रही है, क्योकि आज तक मुसलमानों को  मज़हबो मस्लाको और शिया सुन्नी वहाबी में बाँट कर मुस्लिम धर्म गुरु अपना भला करते रहे और अपना घर भरते रहे क्योकि इन्हे भी अपने नेतृत्व को खोने का सबसे ज्यादा भय और डर था, इस लिए इनके खिलाफ आवाज़ उठाने वाले को ये अपने अनुयाई से पिटवाते  और  प्रताड़ित करते रहे क्योकि राजनैतिक दल इन धर्म गुरुवो को मैनेज करते रहे है , इसी लिए अब तक भारतीय मुसलमानों का राष्ट्रीय स्तर का कोई नेता है ना किसी भी धर्म  निर्पक्ष राजनैतिक दल मे जो खुल कर मुसलमानों की आवाज़ को उठाने का काम किया हो सिवाय असदुद्दीन ओवैसी और बद्रुद्दीन अजमल के लेकिन इन्हे कथित धर्म  निरपेक्ष दल हमेशा से दबाते या दूरी बनाते रहे हैं "क्यो" ?

जब भी मुसलमानों के अधिकारों की बात होती संवैधानिक संस्थाओं में संसद में तो धर्म  निरपेक्ष दलों से जीते हुए मुस्लिम सांसदों के मुह में ताला क्यो  लगवा दिया जाता हैं, क्योकि कही ना कही तथा कथित ये धर्म  निरपेक्ष राजनैतिक दल भी उन्ही विचार धारा को को फालो करते हैं जो की दक्षिण पंथी विचारों को समर्थन देती रही है।  वैसे मुसलमान नेता तो बी जे पी में भी है !

  लेकिन अब इन छद्म सेक्युलरवादियो  को बहुत हद तक मुसलमान समझने लगा है क्योकि जातीवाद की राजनीति तो हर राज्य में मे हो रही हैं दलित, ओ बी सी, कुर्मी, तो फिर  मुसलमान क्यो नहीं , अब इन मस्लाको से हट कर अपने अधिकारो लिए मुसलमानों को अपने अधिकारों को समझना होगा ! आप किसी भी मस्लक के  मानने  वाले हो आपको  बेशक मानिये  लेकिन अपने अधिकारों के लिए इन्हे बीच मत लाइए अपने अधिकारों को जानिए अपनी इबादत को राजनीती से जोड़ने वालो को मुँह तोड़ जवाब दीजिये  अपने अधिकारों के   लिए लड़िये  
भारतीय संविधान को समझ  कर  अपने हक़ की लडाई लड़ने वालों को पहचाना  कर  अपना वोट दीजिये कौन आपके अधिकारो  के लिए आवाज़ उठा रहा है। और कौन आपको अपना वोट बैंक बना कर उपयोग करता जा  रहा है, तथा कथित सेक्युलर दलों ने मुसलमानों की मानसिकता को दल विशेष का डर और भय दिखा कर जकड़ रखा था जिससे मुसलमानों को बाहर निकलना होगा

बिहार चुनाव के बाद हर तरफ से लोग असदुद्दीन ओवैसी के ऊपर प्रहार कर रहे हैं कोई उन्हें वोट कटवा बता रहा है कोई उन्हें भाजपा की बी टीम बता रहा है तरह-तरह के आरोप लगाए जा रहे हैं।

कांग्रेस पार्टी लगातार असदुद्दीन ओवैसी और उनकी पार्टी पर वोट कटवा होने और बीजेपी की बी टीम होने जैसा इल्जाम लगा रही है यह इल्जाम सिर्फ असदुद्दीन ओवैसी या उनकी पार्टी पर नहीं बल्कि उनको वोट देने वाले हजारों लाखों वोटर्स के ऊपर भी इल्जाम है। क्या कांग्रेस ने तेजस्वी यादव की सीटों को कम करने का काम नहीं किया! क्या मुसलमान हमेशा दूसरी सियासी पार्टियों का वोटर्स बन कर रहे क्या वह अपनी पार्टी अपना नेता नहीं बना सकती है। यही तो हमारा लोकतंत्र है।

और सबसे अहम बिंदु यह है कि असदुद्दीन ओवैसी ने जिन 5 सीटों पर विजय हासिल की है वहां से मुसलमानों नहीं बल्कि हिंदू और, दलित भाइयों तथा अन्य इन सब का वोट मिला है किसी एक तबके का वोट पाकर कोई सीट नहीं जीतता है इस बात को हमें समझना होगा झूठी और जबरदस्ती निराधार बातें करने से कोई फायदा नहीं है

2 प्रतिशत से लेकर 5 प्रतिशत वाले समुदायों ने भी अलग-अलग राज्यों में अपने जातिय आधार पर एक क्षेत्रीय दल बना रखें हैं लेकिन 10 फीसदी से लेकर 30 फीसदी वाले मुस्लिम समुदाय ने एक भी क्षेत्रीय दल नहीं बनाया । यानी मुस्लिम समुदाय ने बीजेपी को रोकने के नाम स्वंय को सत्ता से दूर रखकर कांग्रेस,  सपा, बसपा , राजद , तृणमूल कांग्रेस पर विश्वास करते हुए को सत्ता सौपते रहे । जबकि इन सभी दलों ने कभी भी बीजेपी को रोकने के लिए प्रयास नहीं किया । यदि प्रयास करते तो सभी दल गठबंधन करके चुनाव लङते । और सबसे अहम बात यह है कि यह सभी दल कभी न कभी बीजेपी के साथ सत्ता का मज़ा ले चुके हैं। बस एक मुस्लिम समुदाय हैं जो सबसे अधिक संख्या में होने के बावजूद भी न तो क्षेत्रीय दल बनाया और न ही राजनीति करना सीखा। सभी जातियों की तरह यदि मुसलमान  भी क्षेत्रीय दल बनाते तो आज मुसलमानो की दशा और दिशा कुछ और ही होता जिसका ताज़ा तरीन उदाहरण बिहार, मे देखा जा सकता हैं। जहां मुसलमानो ने एक जुट होकर सेकुलर पार्टियों को नकार दिया जिन्होंने मुसलमानो को बस कोई  एकाध एम ए ले या सांसद का टिकट दे कर  खुश  कर दिया जाता है ! बाद में यही जनप्रतिनिधि कठपुतली की तरह नाचते है !
चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार बिहार में चार करोड़ से ज्यादा वोटिंग हुई थी और इनमें से 1.24 फीसद वोट एआईएमआईएम को मिले हैं। और कांग्रेस को सबसे ज्यादा प्रॉब्लम इन 1.24% वोटों से है। 2015 में ओवैसी की पार्टी को 0.5% वोट मिले थे। मतलब यह हुआ कि ओवैसी की पार्टी ने तरक्की की। अगर आप इतने ज्यादा धर्मनिरपेक्ष अर्थात सेकुलर हैं और मुसलमानों के वोट पर अपने अधिकार को जताते हैं तो क्यों नहीं ओवैसी की पार्टी को अपने गठबंधन में मिला लिया अगर शायद मिला लिया होता तो आपकी 10 से 12 सीटों में बढ़ोत्री हो सकता था। शायद आपको मुस्लिम वोटर्स चाहिए मुस्लिम नेता नहीं वह भी पढ़ा लिखा।

सबसे पहली बात तो यह है कि जितनी भी राजनीतिक पार्टियां हैं सब को यह संवैधानिक अधिकार प्राप्त है कि वह चुनाव लड़ें और अगर कांग्रेस को या किसी पार्टी को यह लगता है कि ओवैसी की पार्टी के लोगों से उनका वोट कट जाता है तो जितनी पार्टियां हैं सबके ऊपर इलेक्शन लड़ने पर रोक लगा दें और अकेले चुनाव लड़ें । यह कैसी मूर्खता पूर्ण बातें हैं।

दर असल में राहुल गांधी और सोनिया जी को दिग्भ्रमित किया जा रहा है क्योकि कुछ लोग इन्हे भटका रहे हैं जो कांग्रेस को धीरे धीरे सत्ता से हटाना चाहते हैं, कांग्रेस मे यही विचार धारा के लोग दीमक की तरह चाटने मे लगे हुए जिसका उदाहरण है, ज्योतिर् आदित्य सिंधिया,रीता बहुगुणा जैसे लोग
जिन्हे समझना होगा?

 

 

21-Nov-2020

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