के.डी. सिंह
   7अगस्त 1990 को मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने की घोषणा संसद मे तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने किया था၊ देश की बहुसंख्यक आबादी अन्य पिछड़ों को समाज की मुख्य धारा में शामिल करके हक़ व अधिकार देने वाले ऐसे महान व्यक्तित्व को नमन ၊हलांकि
सारे हिंदुवो एक हो जाओ का नारा बुलंद करने वाले लोगों से उम्मीद थी कि देश की बहुसंख्यक आबादी के हक़ व हुकूक के हर निर्णयव कल्याण हेतु बनाई जाने वाली नीतियों में जिस तरह से नारा लगवाकर पिछड़ों को भी हिन्दू मानकर जयकारा लगवाते हैं उसी तरह उनके हक के लिए भी पुरजोर समर्थन करोगे।और जहां भी पिछड़ों के साथ जाति,धर्म,वर्ण इत्यादि के नाम पर शोषण,अत्याचार हो रहा होगा वहां पर  पहल करेगी? जैसे अन्य मुद्दों पर चिल्लाकर कहते हैं कि सारे हिंदुवो एक हो जाओ उसी तरह कहेंगें कि समता मूलक समाज के लिए समाज की मुख्यधारा से वंचित अन्य पिछड़ों को भी अधिकार व सम्मान पाने का हक़ है ।लेकिन ऐसा हो.नही रहा है बल्कि उलट लागूमंडल आयोग को दफन करने के षडयंत्र पूर्ण प्रयासों की खबरें आये दिन आते जा रहे है၊
              ओबीसी कोटा अब तक आधा ही भर पाया है, वैसी स्थिति में अगर सरकार नौकरीपेशा लोगों के बच्चों को ओबीसी से बाहर करके ओबीसी कैंडिडेट की संख्या को और कम कर देती है तो इसका फायदा सिर्फ और सिर्फ सामान्य वर्ग को होगा၊क्रीमी लेयर का सिद्धांत जब आया था तब क्रीमी लेयर के लिए आमदनी की लिमिट 1 लाख रुपए प्रति वर्ष थी၊महंगाई के हिसाब से हर तीन साल में इसमें बढ़ोतरी का प्रावधान है၊
      ओबीसी या अन्य पिछड़ा वर्ग संविधान के अनुच्छेद 340 के मुताबिक देश का वह वर्ग है जो शैक्षणिक और सामाजिक रूप से पिछड़ा है. दूसरा पिछड़ा वर्ग आयोग यानि मंडल कमीशन के मुताबिक देश की 52% आबादी इस वर्ग में आती है. चूंकि केंद्र सरकार सामाजिक-आर्थिक और जातीय जनगणना, 2011 के आंकड़े जारी नहीं कर रही है, इसलिए हर किसी को इसी आंकड़े से काम चलाना पड़ता है၊केंद्र सरकार पहली बार हर तरह के नौकरीपेशा लोगों के वेतन को आमदनी की गणना में इस्तेमाल करने जा रही है၊ऐसी खबरें छपी हैं कि राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग इस बात के लिए तैयार हो गया है कि वेतन को आमदनी में गिना जाए हालांकि आयोग की तरफ से इसकी आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है लेकिन सरकार की इस बारे में मंशा स्पष्ट है?केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के नेतृत्व में गठित मंत्रियों के समूह और इसके निर्धारण के बारे में सिफारिश देने के लिए बनी बीपी शर्मा कमेटी की इस बारे में एक ही राय है၊विरोध आयोग की तरफ से हुआ और सूचना है कि आयोग के सदस्यों पर दबाव डाला जा रहा है कि वे सरकार की राय पर मुहर लगा दें၊अगर ऐसा होता है तो सरकारी से लेकर निजी क्षेत्र के लाखों लोगों के बच्चे ओबीसी कोटे से बाहर हो जाएंगे၊
           क्रीमी लेयर की अवधारणा दरअसल संविधान या मंडल कमीशन में नहीं है. जब केंद्र सरकार की नौकरियों में 27% ओबीसी आरक्षण को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई तब 9 जजों की संविधान पीठ ने इंदिरा साहनी मुकदमे में ये फैसला दिया कि सरकार अन्य पिछड़ा वर्ग को 27 प्रतिशत आरक्षण दे सकती है लेकिन ये आरक्षण अन्य पिछड़ा वर्ग के क्रीमी लेयर यानि आगे बढ़े हुए तबके को नहीं दिया जाएगा၊इसी के आधार पर केंद्र सरकार ने 1993 में आदेश जारी करके निर्धारित किया कि कौन कौन से लोग क्रीमी लेयर में आएंगे၊इसमें संवैधानिक पदों पर मौजूद व्यक्ति, क्लास वन अफसर और कई तरह की कटेगरी निर्धारित की गई၊कुल आमदनी की सीमा 1 लाख रुपए सालाना निर्धारित की गई. लेकिन वेतन की आय को आदमनी में नहीं जोड़ा गया၊अब पहली बार मोदी सरकार वेतन को आमदनी में जोड़कर क्रीमी लेयर का निर्धारण करना चाहती है. सरकार की तरफ से इसके लिए तर्क दिया जा रहा है कि अभी आमदनी की गणना को लेकर बहुत उलझन है. उन पेचीदगियों से बचने के लिए हर तरह की आमदनी, जिसमें वेतन शामिल है, को क्रीमी लेयर की गणना में शामिल किया जाए၊लेकिन ये वो बात है जो सरकार सार्वजनिक रूप से कह रही है, इसके पीछे भाजपा और. विशेषकर संघ की दो मंशा है၊
       एक, भाजपा अपने प्रतिबद्ध मतदाताओं को ये संदेश देगी कि उसने अन्य पिछड़े वर्ग के नौकरीपेशा वर्ग के बड़े हिस्से को ओबीसी कोटे से बाहर कर दिया है, जिससे आरक्षण का लाभ अब गरीब ओबीसी को मिलेगा၊इस तरह  ओबीसी वोट में सेंधमारी करना चाहती है, जो तमाम कोशिशों के बावजूद अब तक उसका नहीं हुआ है၊और दो, बीजेपी अपने सवर्ण कोर वोटरों को कहेगी कि उसने अन्य पिछड़ा वर्ग को खंड-खंड कर दिया है । क्योंकि. सवर्णों को सबसे ज्यादा चुनौती अन्य पिछड़ा वर्ग से ही मिलती है၊सवर्ण तुष्टीकरण की दिशा में भाजपा का ये दूसरा बड़ा कदम होगा၊ इससे पहले बीजेपी सवर्णों को 10 प्रतिशत आरक्षण दे चुकी है၊ अगर नौकरीपेशा ओबीसी का बड़ा हिस्सा ओबीसी आरक्षण से बाहर होता है तो इससे कुल मिलाकर अन्य पिछड़ो की सत्ता और संसाधनों पर दावेदारी कमजोर होगी  और खासकर पढ़ा-लिखा मिडिल क्लास ही उस वर्ग की दावेदारी को मजबूत करता है और वही उस तबके के हितों की रक्षा करने में समर्थ होता है၊अगर ये तबका ओबीसी से काट कर अलग कर दिया गया, तो न तो ओबीसी आरक्षण को बचा पाना आसान होगा?
       क्रीमी लेयर की पूरी धारणा ही समस्यामूलक है၊संविधान का आर्टिकल-340 शैक्षणिक और सामाजिक पिछड़ापन की बात तो करता है लेकिन उसमें आर्थिक पिछड़ापन शब्द नहीं है. कुछ जातियों का सामाजिक पिछड़ापन इसलिए नहीं है कि वे गरीब हैं. उनके साथ अवमानना या अपमान का व्यवहार इसलिए होता है क्योंकि वे जातिक्रम में नीचे हैं၊ये आर्थिक नहीं, सामाजिक समस्या है၊ वैसे भी आरक्षण गरीबी उन्मूलन का कार्यक्रम नहीं है၊ आरक्षण का उद्देश्य सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन को दूर करना और राजकाज में जिन समूहों की हिस्सेदारी नहीं है या कम है, उन्हें हिस्सेदारी देना है၊ लेकिन
सरकार संविधान की मूल भावना की अनदेखी करके .आरक्षण के लिए आर्थिक आधार को आगे बढ़ा रही है. मिसाल के तौर पर, 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले सामान्य वर्ग को आरक्षण देने के लिए संविधान के अनुच्छेद 15(4) और 16(4) में संशोधन किया गया၊जाहिर है की भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार मंडल कमीशन के पिछले तीस साल के कामकाज को बेअसर करना चाहती है. राजकाज में सामाजिक विविधता लाने के प्राथमिक उद्देश्य से मंडल कमीशन ने अपनी रिपोर्ट में केंद्र सरकार की नौकरियों में ओबीसी को 27% रिजर्वेशन देने की सिफारिश की थी. मंडल आयोग ने ओबीसी को समर्थ और सक्षम बनाने के लिए 40 सिफारिशें की थीं, जिनमें से सिर्फ 2 पर ही अमल हुआ है और वह भी आधा-अधूरा ၊ जिसे खुद भाजपा सरकार संसद के दोनों सदनों पर सांसदों के सवालों के जवाब में कई बार बता चुकी है कि अन्य पिछड़ा वर्ग  कोटा अभी तक भर नहीं पाया है ၊

लेखक के अपने  निजी विचार है !

12-Aug-2020

Related Posts

Leave a Comment