नवभारत टाइम्स में रहते की तो याद नहीं कि राजीव गांधी को अक्षम मान लिया हो..हालांकि 1986 में वीपी सिंह ने वित्तमंत्री पद से हटा कर रक्षामंत्री बनाये जाने का बदला निकालना शुरू कर दिया था.. और राजीव गांधी के सबसे कमजोर पक्ष अमिताभ बच्चन और उनके भाई अजिताभ को निशाना बनाते हुए बोफर्स में कमीशन खाने का मुद्दा उछाल दिया था..

वीपी सिंह के राजीव के खिलाफ उछाले गए इस मुद्दे को आरएसएस और रामनाथ गोयनका ने तेजी से अपनी मुट्ठी में दबाया और अभियान छेड़ दिया..वीपी ने कॉंग्रेस छोड़ दी और मसीहाई अंदाज़ में जनमोर्चा टाइप मंच पर बैठ भजन कीर्तन करने लगे (23 साल बाद अन्ना हजारे ने बिल्कुल वीपी सिंह के नक्शे कदम पर चलते हुए मनमोहन सरकार को निशाना बनाया था..तो समझ सकते हैं कि खेल के तरीके कितने पुराने हैं और कांग्रेस ने सबक लेना नहीं सीखा)..

नवभारत टाइम्स छोड़ कर जनसत्ता चंडीगढ़ जब पहुंचा तो देखा गोयनका के दोनों पालतू अरुण शौरी और प्रभाष जोशी की तोपें राजीव गांधी पर गोले दाग रही हैं और वीपी सिंह संघियों के साथ हय्या हो हय्या हो कर रहे हैं..कुछ दिन बाद वामपंथी भी शामिल हो गए और वीपी सिंह दोनों की गोद में खेलने लगे..

अब रुकिए..यहां से एक तार 1974 के जेपी के बिहार आंदोलन से भी जुड़ा है....तब भी उस आंदोलन का संचालन इंडियन एक्सप्रेस और रामनाथ गोयनका कर रहे थे और बम्बई का एक्सप्रेस टॉवर और दिल्ली का राजघाट ये दोनों जेपी और गोयनका की रणनीतिक स्थली बने हुए थे..बाद में जब जेपी के कीन्स के पूर्ण रोजगार के सिद्धांत टाइप वाले काल्पनिक सम्पूर्ण क्रांति आंदोलन से जब राजनीतिक दल जुड़ने लगे तो गोयनका संघ और जनसंघ को पूरे उत्साह के साथ जेपी से जोड़ने में जुट गए..और फिर संघ जेपी के इतना नज़दीक पहुंच गया कि जेपी खुले आम अपने को संघी कहने में कतई नहीं हिचकते थे..

अब इस खेल को समझने को थोड़ा और पीछे चलिए..1971 के युद्ध में इंदिरा गांधी ने जिस तरह अमेरिकी राष्ट्र्पति निक्सन और उनके सलाहकार किसिंजर को उनकी औकात दिखाई और पाकिस्तान को तोड़ कर बांग्लादेश बनवाया, तो अमेरिका को इंदिरा गांधी को खत्म करने के लिए सीआईए को तो उतारना ही उतारना था..इधर किसिंजर चूंकि अमेरिका की हमेशा से सबसे मजबूत रही यहूदी लॉबी के नुमाइंदे थे तो उन्हें भारत में संघ का संगठन मिल गया और बरसों से दिल में नेहरू-गांधी परिवार को लेकर ज़हर का पोषण कर रहे रामनाथ गोयनका की मार्फत संत नेता जयप्रकाश नारायण को मैदान में उतारने लायक मुद्दे तलाश लिए गए..

कुल मिलाकर देवी दुर्गा की तरह पुजती आ रहीं इंदिरा गांधी 1975 के शुरुआती महीनों में भारत माता की सबसे बड़ी दुश्मन के रूप में स्थापित कर दी गयीं.. घटनाक्रम बहुत तेजी से बदला.. इंदिरा गांधी ने अपने छोटे बेटे के कहने पर कोर्ट के आदेश को किनारे कर उसी साल जून में  देश में इमरजेंसी लगा दी..अब यहां फिर देखिए कि एक महीने बाद ही बांग्लादेश के निर्माता शेख अब्दुल्ला, उनके परिवार और उनके मंत्रिमंडल के कई सारे सदस्यों का खून कर दिया और यह क़त्लेआम बांग्लादेश में कई महीनों चला..इसके पीछे सौ फीसदी सीआईए का हाथ था..शेख मुजीब की हत्या इंदिरा गांधी की बड़ी विफलताओं में गिनी जाती है..थी भी उन पर बहुत बड़ी चोट..

कुल मिलाकर गोयनका और संघ के कई खेलों में 1977 में कई  दलों की चर्बी से बनी जनता पार्टी की सरकार बनना भी एक बहुत खेल था..चूंकि संघ को अभी देश में वो मान्यता नहीं मिली थी, इसलिए गोयनका अटल को तो नहीं, लेकिन उनसे भी ज़्यादा घातक इंसान मोरार जी देसाई को संघ की मदद से जगजीवन राम को किनारे कर प्रधानमंत्री बनवाने में सफल हुए, जबकि पूरा संसदीय दल उनके विरोध में था..लेकिन धुर दक्षिणपंथी जेबी कृपलानी के जरिये जेपी को तैयार किया गया..और उस समय जेपी की बात काटने का सवाल ही नहीं उठता था..उस समय चौधरी चरण सिंह भी जगजीवन राम को न बनवाने के लिए अड़ गए..मतलब कि पूरी जनतापार्टी की मति मारी गई थी जो मोरार जो को प्रधानमंत्री बनवा दिया..

मधु दण्डवते और मधु लिमये जैसे कुछ समाजवादी नेताओं के अलावा पूरा मंत्रिमंडल सीआईए के इशारों पर काम कर रहा था..तभी विदेश मंत्रालय अटल को और सूचना मन्त्रालय आडवाणी को मिल गए..यानी संघ के हवाले हो गए दूर तक और देर तक असर डालने वाले दो विभाग. उसके बाद नौटंकियों का अंबार लग गया.. फिर तो जनतापार्टी की सरकार का चरमरा कर गिरना, इंदिरा गांधी का सत्ता में आना और फिर सीआईए का सक्रीय होना, पंजाब में आतंकवाद को बढ़ावा, और स्वर्णमंदिर में सैन्य कार्रवाई, फलस्वरूप इंदिरा गाँधी की हत्या वगैरह क्या मारियो पूजो के उपन्यास गॉड फादर की याद नहीं दिलाते!!जिसमें डॉन वीटो कारलोन के जमाई की मदद से डॉन के ही बड़े बेटे सोनी की हत्या करवाने का बृहद मंच तैयार किया जाता है मात्र एक वेश्या के फोन जरिये..

अब फिर 1987 के दिनों में लौटा जाए..अब तक सबसे बड़ा बहुमत पा कर सरकार बनाने वाले राजीव गांधी किस हश्र को प्राप्त हए और किस तरह यहां वीपी सिंह के अलावा राजीव गांधी को बरबाद किया गया खुद उनके कज़िन अरुण नेहरू के हाथों..वीपी के हटते ही राजीव गांधी का सारा विश्वास अरुण नेहरु पर था, लेकिन अरुण नेहरु खेल गए संघ के हाथों में, और उन्होंने ही राजीव गांधी से शाहबानो जैसे दो कौड़ी के मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला बदलवा दिया और तब आरिफ मोहम्मद खान जैसे छुटभैये महान क्रांतिकारी बन गए.. और दूसरे गृहमंत्री रहते अरुण नेहरु ने राजीव को फंसा कर राम मंदिर का ताला खुलवा कर कब से बंद पड़ा संघ का और संघी पत्रकारों का कारोबार खड़ा कर दिया..यानी इस बार अरुण नेहरु ने वही खेल खेला गॉड फादर के जमाई वाला..

गोयनका और देवीलाल जैसे कद्दावर नेता की मेहनत से 1989 के चुनाव में वीपी सिंह मैदान में ताल ठोंकने लायक सीटें पा गए और फिर वीपी को मिल गयीं संघ और वामपंथियों की बैसाखी.. मुराद पूरी हुई राजा साहब की, बन गए एक वर्षीय प्रधानमंत्री..लेकिन प्रधानमंत्र

द्वारा : सैय्यद क़ासिम 

21-May-2020

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