मित्रों, हम कल 15 अगस्त को आजादी की जश्न मनाने वाले हैं। लेकिन हमें एक बार जरूर सोचनी चाहिए कि, आजादी के 72 वर्ष बाद भी क्या हमने सफाई कर्मचारी वर्ग के लिए ऐसा कोई कार्य किया है जिससे इन वर्ग को आजाद महसूस हो। समाज का एक हिस्सा यदि कमजोर है तो उसको उपर उठाकर सबके बराबरी में लाना राज्य का संवैधानिक कर्तव्य है। लेकिन आज भी इन वर्ग की स्थिति अति गंभीर है ।

आयिए कुछ बातो के उपर गौर करें -

सन 2013  से पहले तक छग में पूरे प्रदेश में सफाई कर्मचारी की नियमित पद पर नियुक्ति होती थी, उसके बाद सन् 2013 में ही एक कानून आया जो हमारे सफाई कर्मचारियों को समाज के मुख्य धारा में जोडने, उनके आर्थिक,सामाजिक, शैक्षणिक विकास करते हुए गरिमामय जीवन जीने के लायक बनाने, हाथ से मैंला उठाने वाला काम को प्रतिषेध करते हुए मानव गरिमा के अनुरूप हाथ में ग्लोब्स, गम बुट, मास्क, अन्य सुरक्षा उपकरण आदि के साथ सफाई की काम करवाने नई कानून "हाथ से मैला उठाने वाले कर्मियों का नियोजन का प्रतिषेध तथा उनका पुनर्वास अधिनियम 2013"( " The Prohibition of Employment as Manual Scavenger and Their Rehabilitation Act 2013 ")तत्कालीन कांग्रेस के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने कानून बनाए जो सभी प्रदेशों के लिए कंपल्सरी रखा गया। जबकि सन 1993 में बनी कानून "हाथ से मैला उठाने वाले कर्मियों तथा शुष्क सौचालय निर्माण का प्रतिषेध अधिनियम. 1993 " "The Employment of Manual Scavengers and Constructions of Dry Latrines Prohibition Act 1993   जो सभी प्रदेशों के लिए कंपल्सरी नहीं था, Optional था जिस कारण  कुछ ही प्रदेशो के द्वारा उक्त 1993 का कानून को एडॉप्ट किया गया था, यहां तक कि छत्तीसगढ़  प्रदेश मै भी लागू नहीं किया गया था।

2013 की कानून आने के बाद तथा यह कनु  कंपल्सरी और mandatory होने के कारण छग प्रदेश उक्त कानून को अडॉप्ट किया ।जब पहली बार यह कानून 2013 में आया , तत्कालीन बीजेपी सरकार ने 2013 का कानून पालन करवाना छोड़ कर इसके विपरित सफाई कर्मचारी पद को ही समाप्त (dying cadre मृत घोषित)कर दिया और पूरे सफाई कर्मचारियों को निजी ठेकेदार के हवाले कर सफाई कर्मचारियों तथा श्रमिको के लिए बनी कानून का खुले आम उल्लंघन किया जा रहा है। यहां तक कि अंग्रेजों के समय बनी कानून तथा बाबासाहेब  के समय बनी कानून का भी पालन नहीं किया जा रहा है। संभवतः छत्तीसगढ़ राज्य पूरे भारत में एक मात्र प्रदेश हैं जहां सफाई कर्मचारी पद को समाप्त कर दिया गया है । 

यहां तक कि कोई सफाई कर्मचारी सेवाकाल के दौरान समय से पहले जिसका निधन हो गया, और परिवार का एक मात्र कमाने वाला के चले जाने के बाद मृतक के आश्रित को भी कोई अनुकम्पा नियुक्ति नहीं दी जा रही है। सैकड़ों की संख्या में अनुकम्पा नियुक्ति प्रकरण लटकी हुई है।

श्रमिको के लिए बनी निम्न कानून का पालन नहीं हो रहा है  :-

(1)न्यूनतम मजदूरी अधिनियम 1948

(2)EPF Act 1952

(3)Employee's State Insurance Act 1948

(4)Maternity Benefit Act 1961

(5)The Prohibition of Employment as Manual Scavenger and Their Rehabilitation Act 2013

15 August को किराना दुकान में काम करने वाला को भी छुट्टी मिलती है, लेकिन इन वर्गो के किस्मत में छुट्टी चीज का नाम नहीं है ।सुबह उठ कर सहर को चमकाने वाले लोगो के साथ कब तक होता रहेगा शोषण ......

हम सरकार से निवेदन करते है इन वर्गो के हितों के लिए बनी नियम व कानून व संवैधानिक उपवंधो का पालन करते हुए समाज के मुख्यधारा में जोड़ा जाए तब सहीं मायने में देश में आजादी की जश्न सार्थक होगा।

एडवोकेट जन्मेजय सोना, राष्ट्रीय महासचिव (भारतीय सफाई कर्मचारी महासंघ) मो. 8602200999, 8839092600

14-Aug-2019

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