आज देश में पानी का संकट खुल कर दिखाई देने लगा है। दुनिया के कई भागों में खासकर विकासशील देशों में भयंकर जलसंकट है और अनुमान है कि 2025 तक विश्व की आधी जनसंख्या इस जलसंकट से दो-चार होगी। जल विश्व अर्थव्यवस्था में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

आज पूरे विश्व में पेयजल की कमी का संकट मँडरा रहा है। कहीं यह गिरते भू-जल स्तर के रूप में है तो कहीं नदियों के प्रदूषित पानी के रूप में और कहीं तो सूखते, सिमटते तालाब और झील के रूप में। इसका कारण है, इन स्रोतों से पानी का भारी दोहन किया जाना। पानी के संरक्षित रखने की जरूरत को तो छोड़ ही दिया गया है। पूरे विश्व के यूरोप के प्रभाव में आने के बाद से एक ही दर्शन सामने आयी कि प्रकृति में जो भी चीजें उपलब्ध हैं उनका सिर्फ दोहन करो।

पेयजल का प्रत्यक्ष संकट अधिकतर तीसरी दुनिया के देशों में है, क्योंकि भारी कीमत देकर बाहर से जल मँगाने की इनकी आर्थिक स्थिति नहीं है। दूसरे विभिन्न औद्योगिक इकाइयों द्वारा भी भू-जल का जमकर दोहन किया गया और इनसे नदियाँ भी प्रदूषित हुईं। पिछली सदी में अफ्रीका को विश्व का फलोद्यान कहा जाता था। परन्तु आज 19 अफ्रीकी देश पेयजल से वंचित हैं। इंसान बिना पानी के तीन दिन भी जिन्दा नहीं रह सकता। पृथ्वी के कई भू-भाग पेय जल के संकट से गुजर रहे हैं।भूमण्डल की गर्मी बढ़ने के साथ-साथ पृथ्वी का जल तल 3 मीटर प्रतिवर्ष की दर से गिर रहा है और इस समय प्रतिवर्ष 160 अरब क्यूबिक मीटर की कमी दर्ज की गई है। बदलता पर्यावरण कई स्थानों को सूखे में तब्दील कर चुका है।

भारत में भी पेयजल का संकट कई तरह से उत्पन्न हो चुका है। दिल्ली में पानी की किल्लत के चलते पानी हरियाणा से मँगाया जाता है। यहाँ यमुना का पानी पीने योग्य नहीं रह गया है, साथ ही भू-जल स्तर भी तेजी से नीचे जा रहा है। जाड़े में ही यहाँ पानी का ऐसा संकट है कि दिल्ली में रहने वाले मध्यम वर्ग के लोग रोजाना पानी खरीद कर पी रहे हैं।

मुम्बई में तो खारे पानी का ही संकट उत्पन्न हो गया है। भूगर्भीय मीठा पानी लगभग समाप्त होने के कगार पर है। मुम्बई में जमीन की भीतरी बनावट कुछ ऐसी है कि बारिश का पानी एक निर्धारित सीमा तक ही जमीन के भीतर तैरता रहता है,जबकि ज्यादा गहराई में खारा पानी पाया जाता है। विश्व के सबसे अधिक वर्षा के क्षेत्र चेरापूँजी तक में भी पेयजल का संकट उत्पन्न हो गया।

अधिकांश शहरों में ट्यूबवेल के माध्यम से ही पीने का पानी उपलब्ध कराया जाता है। इन ट्यूबवेलों के द्वारा भारी मात्रा में भूमिगत जल को बाहर निकाला जाता है और यह पानी पूरे शहर की पक्की नालियों के द्वारा शहर से बाहर चला जाता है। मतलब यह कि भूमिगत जल के केवल दोहन का ही ध्यान है, घटते जल स्तर की चिंता नहीं। शहरों में जो बड़े और छोटे तालाब थे उन्हें भी भरकर बड़ी-बड़ी इमारतें खड़ी कर दी गई हैं।

सरकार का ध्यान इस तरफ नहीं है। सिर्फ कागजी कार्यवाही कर लेने से ही समस्या हल नहीं होगी। आज हम पेड़ काटते जा रहे हैं। वातावरण में आक्सीजन कहां से आयेगी। ज़मीन पक्की करते जा रहे हैं। बरसात का पानी कहां जायेगा। पेड़ और इंसान का बहुत गहरा रिश्ता है और हम इसको तोड़ रहे हैं।

इंसान को पानी मिले या ना मिले मगर घर, गाड़ी, सड़क धोना जरूरी हो गया नतीजतन पानी की समस्या बढ़ती जा रही है। भारत में जागरूकता की कमी है। सरकार को चाहिए कि वह नियम बनाए कि हर घर के बाहर दो पेड़ घर का मालिक जरूर लगाये अन्यथा उसके घर का असेसमेंट रद्द कर दिया जाये। सरकार को भी चाहिए कि हर शहर में सड़क के दोनों तरफ पेड़ लगाए इससे हमारी कई समस्याओं का समाधान होगा। तापमान कम होगा, खूबसूरती बढ़ेगी, बरसात में पानी जड़ों के सहारे ज़मीन में पहुंचेगा। जनता से भी निवेदन है कि इस काम के लिए आगे आयें सरकार की पहल का इंतेज़ार ना करें।

सैय्यद एम अली तक़वी, पत्रकार (हम्दे मुल्क उर्दू) (The Revolution News) 

29-May-2019

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