नई दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने रिजर्व बैंक ऑफ़ इंडिया को कड़ा संदेश देते हुए आदेश दिया है कि वह जान-बूझकर कर्ज ना चुकाने वालों और अपनी वार्षिक जांच रिपोर्टों को सूचना के अधिकार के तहत सार्वजनिक करे. शीर्ष अदालत ने आरटीआई कार्यकर्ता सुभाष चन्द्र अग्रवाल द्वारा दायर की गई अवमानना याचिका की सुनवाई के दौरान यह आदेश दिया. याचिका में कहा गया था कि आरबीआई ‘रिजर्व बैंक ऑफ़ इंडिया बनाम जयंतीलाल मिस्त्री और अन्य’ मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी विशेष दिशा-निर्देशों का पालन नहीं कर रहा है.  इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि आरबीआई के लिए सूचना के अधिकार के तहत सूचनाएं सार्वजनिक करना अनिवार्य है.

वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण और प्रणव सचदेवा के माध्यम से दायर इस याचिका में कहा गया था कि आरबीआई ने सूचनाओं को सार्वजनिक नहीं करने के लिए अलग से नीति बना ली और अपने सूचना अधिकारियों को भी यह आदेश दे दिया कि वह इस केंद्रीय बैंक से मांगी जाने वाली सभी तरह की सूचनाओं को सार्वजनिक नहीं करे. याचिका में कहा गया था कि इन सूचनाओं में वे सूचनाएं भी शामिल थीं जिनको सार्वजनिक करने का आदेश खुद सुप्रीम कोर्ट ने ही दिया था. इस तरह आरबीआई ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्लंघन किया.

‘रिजर्व बैंक ऑफ़ इंडिया बनाम जयंतीलाल मिस्त्री और अन्य’ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि वह उन सभी बैकों से जुड़ी सूचनाएं सार्वजनिक करें जिनका विनियमन वह करता है. आरबीआई ने बैंकों के साथ आर्थिक हितों का हवाला देकर ऐसी सूचनाएं सार्वजनिक करने का विरोध किया था. उसने कहा था कि ऐसा करना बैकों के साथ विश्वासघात करना होगा. सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को पूरी तरह निराधार बताते हुए कहा था कि वास्तव में सूचनाएं सार्वजनिक नहीं करने से आर्थिक नुकसान होगा. जस्टिस एल नागेश्वर राव और एम आर शाह की पीठ इस मामले में आरबीआई से इस कदर नाराज़ थी कि उसने केंद्रीय बैंक को शीर्ष कोर्ट के आदेशों का सख्ती से पालन करने की हिदायत दी. पीठ ने कहा कि अगर बैंक ऐसा नहीं करता है तो उसे कोर्ट की अवमानना के गंभीर परिणाम भुगतने होंगे. कोर्ट के आदेश का पालन करने का उसके पास आखिरी अवसर है.

26-Apr-2019

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