नई दिल्ली : एजेंसियों से 

केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) में मचे अंदरूनी घमासान के बीच अब केंद्र सरकार और छुट्टी पर भेजे गए सीबीआई डायरेक्टर आलोक वर्मा आमने-सामने आ गए हैं। सरकार ने इस पर कहा है कि कई बार रिमाइंडर भेजने के बाद भी केंद्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी) को दस्तावेज नहीं सौंपे गए। आपको बता दें कि सीबीआई से जुड़ा संकट अभी थमा नहीं है। सरकार की ओर से पहली बार इस मसले पर कहा गया कि संस्था के भीतर पनपी स्थिति दुर्भाग्यपूर्ण और विचित्र है। हालांकि, सरकार ने यह भी साफ कर दिया कि वह इसमें कुछ नहीं कर सकती है। जांच का अधिकार सीवीसी के पास ही है। बुधवार (24 अक्टूबर) को सूचना और प्रसारण मंत्रालय की ओर से कहा गया कि 24 अगस्त 2018 को मिली शिकायत की रीसिप्ट (सीबीआई के कुछ वरिष्ठ पदाधिकारियों पर कई किस्म के आरोप) के आधार पर सीवीसी ने तीन अलग-अलग नोटिस (सीवीसी एक्ट, 2003 की धारा 11 के अंतर्गत) 11 सितंबर को सीबीआई डायरेक्टर के पास भेजे। इन नोटिस के जरिए उनसे सीबीआई के समक्ष 14 सितंबर के पहले मामले से जुड़ी फाइलें और दस्तावेज पेश करने के लिए कहा गया था।

मंत्रालय के मुताबिक, “दस्तावेज पेश करने के लिए उसने कई मौके दिए थे। यह भी वजह थी कि कई बार सुनवाई स्थगित हुई। 24 सितंबर 2018 को सीबीआई ने आयोग को विश्वास दिलाया कि वह तीन हफ्तों में दस्तावेज पेश करेगा। मगर बार-बार याद दिलाने और खुद उस वादे को पूरा करने की बात कहने के बाद भी सीबीआई डायरेक्टर की तरफ से आयोग को दस्तावेज मुहैया नहीं कराए गए। ऐसे में सीवीसी ने पाया कि सीबीआई डायरेक्टर जांच में सहयोग नहीं कर रहे हैं। हालांकि, पूरे घटनाक्रम के बीच सरकार की सफाई पर कांग्रेस का पलटवार भी आया। पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी ने राजस्थान में हुई रैली के दौरान दावा किया कि वर्मा की छुट्टी सिर्फ इसलिए की गई, क्योंकि उन्होंने राफेल डील से जुड़े कागजात मंगाए थे। पीएम और उनकी सरकार को इसी बात का डर था, लिहाजा उन्होंने वर्मा को अवकाश पर भेज दिया। वहीं, वरिष्ठ अधिवक्ता और कांग्रेसी नेता अभिषेक मनु सिंघवी बोले कि पीएम को राफेलोफीबिया हो गया है। अभी जो सीबीआई में हो रहा है, वैसा गुजरात मॉडल में होता है।

24-Oct-2018

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