गाजीपुर : जिला ग़ाज़ीपुर के दिलदारनगर के ग्राम उसिया में पिछले कुछ दिनों पूर्व घटित घटना ने जिले को हिला कर रख दिया है। एक ओर कानून व्यवस्था की लचर स्थिति को उजागर किया है तो दूसरी ओर गांव के पठानों की करतूतों ने शर्मशार कर दिया है। देश की न्याययालयों को न्याय का मंदिर कहा जाता है इसी प्रकार गांव की पंचायतों को पंच परमेश्वर का दर्जा प्राप्त है, जहाँ सिर्फ न्याय होता है, बिना किसी जात-पात या भेद-भाव के, पर गांव उसिया की पंचायत ने इन लफ़्ज़ों का मतलब ही बदल दिया है। किस प्रकार खाप पंचायत गांव  के दबंग पठानों के हाथ की कठपुतली हो गयी है या यूँ कहें कि बिक गयी है कि एक महिला की बेइज़्ज़ती का बदला चार महिलाओं की बेइज़्ज़ती कर लेने को सही फरमाती है।

उसिया गांव  के पठानों का आतंक दिन प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है। गांव के दलित या अन्य पिछड़ों को तो ये इंसान ही नहीं समझते हैं। ये मात्र इनके लिए गाय-बकरी हैं। आये दिन इन दलितों पर अत्याचार करना, इनकी बहु-बेटियों के साथ छेड़छाड़ करना ये अपनी शान समझते हैं। यह बात कोई छुपी हुई नहीं है। 

गांव के जमालू प्रधान, शरफुद्दीन खां, इक़बाल खां उर्फ़ बाला, रशीद मैनेजर और कुछ अन्य पठान अपने आपको उसिया गांव का रहनुमा समझने लगे हैं। इनके आतंक से गांव का माहौल दिन प्रतिदिन बद से बदतर होते जा रहा है। नहीं समझ आ रहा है कि कौन इनके आतंक से गांव को बचाएगा। गांव न हो गया इन पठानों के अपराध का गढ़ बन गया है। 

आज गांव का एक भी दलित या अन्य पिछड़ा वर्ग समाज अपने आपको सुरक्षित महसूस नहीं कर रहा है और न ही इनके घर की बहु-बेटियों की आबरू सुरक्षित है। पता नहीं कब कौन पठान इनकी बहु बेटी की चुन्नी तार-तार कर दे? गांव से लगा हुआ थाना दिलदार नगर है पर इन पठानों को थाना, कोर्ट कचहरी का, प्रशाशन का कोई डर और भय नहीं है। सबको ये अपनी जेब में भरकर घूमते हैं और गलती से किसी गांव वालों ने इनकी शिकायत कर दी तो बस जो इस शाहजहां(जुलाहे) और उसके घर के बहु बेटी माँ के साथ अभद्र व्यवहार किया है वही दोहराते हैं। गांव के लोगों की जमीन पर कब्ज़ा करना, उनकी फसलों पर कब्ज़ा करना, उनके घर पर कब्ज़ा करना, यही धंधा बन गया है इन पठानों का। जमीन तो छोड़िये, ये कब्रिस्तान, तालाब को भी नहीं छोड़ते हैं। वहां पर भी ये कब्ज़ा कर बैठे हैं। और जब कोई मज़लूम इनकी शिकायत करता है तो उसे शाहजहां की तरह झूठे अपराध के मामले में फसाकर उससे और उसके परिवार से बदला लेते हैं। मार-मार कर उसका दम निकाल देते हैं। 

जिस तरह गांव के पठानों ने अपने बिरादरी के पढ़े लिखे नौजवान लड़कों को इस जात-पात की लड़ाई में झोक दिया है इससे इन नौजवानों का भविष्य अंधकारमय हो गया है। क्योंकि इस प्रकार के खून खराबे से ये अपना भविष्य स्वयं अपने हाथों से बर्बाद कर रहे हैं। इन पठानों की मूर्खता का भुगतान इन बेचारे नौजवान पीढ़ी को अपना भविष्य ख़राब कर भुगतना होगा। 

आज पढ़े लिखे होने के बावजूद भी पठान अपने जंगली रवैये से बाज नहीं आ रहे हैं। वही जंगल राज का कानून आज भी गांव में चल रहा है। वही जंगल राज कानून एक के बदले चार की जान लेना इनका शौक बन गया है। तथाकथित एक महिला की बेइज़्ज़ती का बदला ये उसी प्रकार चार महिलाओं की बेइज़्ज़ती से ले रहे हैं। आज तक उस महिला को न्याय भी नहीं दिला पाए और बदनाम इतना किया कि चारो तरफ इसकी दुर्गन्ध फैली है।  गांव उसिया कब इन पठानों के बहशीपन से मुक्ति पायेगा ये तो खुदा  ही जाने। आज लोग पढ़े लिखे होने के बाद भी, देश में कानून राज होने के बाद भी, स्वयं अपनी खाप-पंचायत बुलाकर अपनी मनमर्ज़ी का फरमान जारी कर गांव के मजलूम लोगों पर अत्याचार कर रहे हैं। इन पठानों को देश के कानून, पुलिस, प्रशाशन किसी का भी सरोकार और डर-भय नहीं है।  क्या बूढ़ा, क्या जवान, सब अपनी मन मर्ज़ी के मालिक हैं। पठानों की क्रूरता का अंत कब होगा? यह गंभीर चिंता का विषय है।

15-Sep-2018

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