देश में कोरोना मरीज़ों की संख्या कितनी है, इसके बारे में दो तरह के आंकड़े आ रहे हैं। एक जो सरकारी जानकारी है और जिसके हिसाब से आज की तारीख़ में यह संख्या 16 लाख से ऊपर है और हर रोज़ 50 हज़ार की दर से बढ़ रही है। दूसरा जिसका सीरो सर्वे के आधार पर अंदाज़ा लगाया जा रहा है और जिसके हिसाब से ऐसे मरीज़ों की संख्या 18 करोड़ के आसपास है।

लेकिन मेरी समझ से ये दोनों ही आंकड़े भ्रामक हैं। जिनको अस्पताल ले जाने की नौबत हो, अगर इस परिभाषा से देखें तो भारत में कोरोना के मरीज़ों की संख्या 20-30 हज़ार के बीच होगी। इनमें भी सारे सीरियस हों, ज़रूरी नहीं। यह अनुमान मैंने कैसे लगाया, इसका हवाला मैं आगे दूंगा। पहले हम 16 लाख और 18 करोड़ के आंकड़ों को समझ लें।

पहले 16 लाख का आंकड़ा देखते हैं। यह कोरोना के मरीज़ों का आंकड़ा नहीं है। यह उन लोगों की संख्या है जो मार्च से लेकर जुलाई के बीच कभी-न-कभी कोरोना वायरस की चपेट में आए थे। इनमें वे लोग भी हैं जो बुख़ार, सर्दी-खांसी, सांस की तक़लीफ़ आदि से पीड़ित हुए। और इस कारण अपनी जांच कराई। इसमें वे लोग भी हैं, जिनमें कोई लक्षण नहीं थे, लेकिन उनकी जांच इसलिए हुई कि वे किसी कोरोना पीड़ित के संपर्क में आए थे।

आज इन 16 लाख लोगों लोगों की क्या स्थिति है? क्या आज भी उनके शरीर में कोरोना वायरस है? नहीं। क्या आज भी उन्हें सर्दी-खांसी-बुख़ार-खांसी-ज़ुकाम है? नहीं। क्या आज भी वे किसी में यह बीमारी फैला सकते हैं? नहीं। तो फिर हम कोरोना मरीज़ों में इनकी गिनती करें ही क्यों? यह तो वैसे ही हुआ कि अगर मेरे अकाउंट में कहीं से एक लाख रुपया आया और मैं उसमें से 90 हज़ार ख़र्च कर दूं, फिर भी सबसे कहता फिरूं कि मेरे खाते में एक लाख रुपये हैं। क्या यह हास्यास्पद नहीं है?

सच्चाई यह है कि इन 16 लाख में से साढ़े 10 लाख से ज़्यादा ठीक हो चुके हैं। और इस हिसाब से वास्तविक मरीज़ों की संख्या 16 लाख नहीं, साढ़े पांच लाख के आसपास है। लेकिन क्या ये साढ़े पांच लाख भी वास्तव में मरीज़ कहे जाएंगे? आप याद कीजिए, पिछले पांच साल में आपको कितनी बार सिरदर्द हुआ, कितनी बार ज़ुकाम हुआ, कितनी बार छींकों से परेशान हुए और कितनी बार आप इन कारणों से अस्पताल में भर्ती हुए? मेरे ख़्याल से एक बार भी नहीं। अधिक-से-अधिक एक-दो दिनों की छुट्टी ले ली होगी और तीसरे दिन फिर से काम पर हाज़िर।

अब ये जो 6 लाख हैं, इनमें से 80 फ़ीसदी यानी क़रीब 5 लाख को तो आपकी तरह सिरदर्द भी नहीं है, सर्दी-ज़ुकाम भी नहीं, न खांसी है, न छींक आ रही है। फिर भी हम उनको कोरोना के मरीज़ कह रहे हैं। सिर्फ़ इसलिए कि ये किसी कोरोना मरीज़ के संपर्क में आए थे और इनका टेस्ट किया गया तो इनके शरीर में वायरस निकला। एक ऐसा वायरस जो उनका कुछ नहीं बिगाड़ पाया। आया, कुछ दिन रहा और ख़त्म हो गया। लेकिन हम हैं कि इन्हें कोरोना विजेता न कहकर उनका नाम कोरोना मरीज़ों की लिस्ट में डाल रहे हैं और बेवजह संख्या को बढ़ा रहे हैं।

अब बचे 1 लाख 20 हज़ार। इनमें से कुछ को हलके-फुलके लक्षण हैं, कुछ को सांस की भारी तक़लीफ़ है और वेंटिलेटर पर हैं और कुछ तो बहुत ही सीरियस हालत में हैं। लेकिन कितनों की हालत सामान्य है और कितनों की सीरियस, इसका कोई डेटा सरकार की तरफ़ से नहीं आया है। हां, एक बार स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन ने बताया था कि उन दिनों देश में कोविड-19 के जितने मरीज़ थे, उनमें से 0.33 प्रतिशत वेंटिलेटर पर थे, 1.5 फ़ीसदी ऑक्सीजन पर और 2.34 फ़ीसदी आईसीयू में।

 

 

अब अगर आज भी ऐसे मरीज़ उसी अनुपात में हों तो देश में वेंटिलेटर और ऑक्सिजन पर निर्भर और आईसीयू में भर्ती मरीज़ों की संख्या 22 हज़ार के आसपास होगी। इनमें भी सारे सीरियस हों, ज़रूरी नहीं। सरकार तो ऐसे आंकड़े सार्वजनिक नहीं कर रही। वर्ल्डोमीटर्स.ऑर्ग की साइट पर दुनियाभर के कोरोना मामलों की जो जानकारी दी गई है, उसके अनुसार भारत में कोरोना के गंभीर और नाज़ुक मरीज़ों की संख्या 8944 है, लेकिन यह संख्या बहुत लंबे समय से अपडेट नहीं हुई है। इसलिए हमें हर्षवर्धन के बयान के आधार पर निकले 22 हज़ार के आंकड़े को ही लेकर चलना होगा। वास्तविक आंकड़ा इससे कुछ हज़ार ज़्यादा या कम हो सकता है।

निष्कर्ष यह कि 16 लाख का जो आंकड़ा आप देख रहे हैं और जो दो दिनों में ही 17 लाख पार कर जाएगा, उस पर ध्यान मत दीजिए। ध्यान उन लोगों की संख्या पर दीजिए, जो अस्पतालों में हैं और सीरियस हैं। उनकी संख्या कितनी है, उसका एक अंदाज़ा मैंने ऊपर दे ही दिया। वैसे बेहतर यही होता कि सरकार भी ख़ुद कोरोना के कुल मामलों और मौजूदा संक्रमितों की संख्या न देकर केवल उन्हीं लोगों की संख्या बताती जो अस्पतालों में हैं। इससे आंकड़ों के कारण लोगों में अकारण आतंक न फैलता।

अब आते हैं 18 करोड़ के आंकड़े पर। यह उन भारतीयों की अनुमानित संख्या है, जिनके बारे में समझा जाता है कि ये लोग पिछले छह महीनों में करोना वायरस की चपेट में आए, लेकिन उनको पता ही नहीं चला कि कब वायरस उनके शरीर में आया और ख़त्म भी हो गया। यह ऐसा आंकड़ा है, जिसका सरकार बहुत प्रचार नहीं कर रही, लेकिन इससे मन-ही-मन ख़ुश ज़रूर हो रही होगी।

प्रचार इसलिए नहीं कर रही कि इतनी बड़ी आबादी के कोरोना-संक्रमित होने से साबित होता है कि कोरोना का प्रसार रोकने की उसकी कोशिशें बेकार रहीं। लेकिन ख़ुश इसलिए हो रही होगी कि इतने सारे लोग अब कोरोना-संक्रमण के ख़तरे से काफ़ी हद तक आज़ाद हो गए और भविष्य में कोरोना-संक्रमण रोकने में अप्रत्यक्ष मदद करेंगे।

पहले यह समझ लें कि यह अंदाज़ा कैसे निकला कि 18 करोड़ भारतीय अब तक कोरोना-संक्रमित हो चुके हैं। इसके लिए सरकार और निजी एजेंसियों की तरफ़ से सीरो सर्वे किया गया। सीरो सर्वे में व्यक्ति के ख़ून में मौजूद कोरोना वायरस की एंटीबॉडी खोजी जाती है। यह जांच कोरोना की बाक़ी जांचों से इस मायने में अलग होती है कि इसमें यह नहीं पता किया जाता कि फलां व्यक्ति के शरीर में कोरोना वायरस ‘है’ या नहीं।

उसमें यह पता लगाया जाता है कि इस व्यक्ति में कोरोना वायरस कभी ‘था’ या नहीं। देश के कई शहरों और ज़िलों में कई हज़ार लोगों की ख़ून की जांच से जो परिणाम निकला है, उसी के आधार पर यह अंदाज़ा लगाया गया कि अगर 100 लोगों में इतने कोरोना-संक्रमित निकले तो पूरे शहर या देश में कितने कोरोना-संक्रमित हो सकते हैं।

चूंकि 18 करोड़ की यह संख्या एक अनुमान भर है, इसलिए आज की तारीख़ में वास्तविक संख्या इससे ज़्यादा या कम हो सकती है। लेकिन उससे कोई अंतर नहीं पड़ता क्योंकि आज अगर कुल संक्रमितों की संख्या 18 करोड़ न होकर 10 या 15 करोड़ हो तो भी कल उसको बढ़कर 15 या 20 करोड़ या उससे ज़्यादा होना ही है। जब लॉकडाउन के बावजूद कोरोना संक्रमण में यह अज्ञात वृद्धि होती रही तो अनलॉक-3 में तो इसका बढ़ना सौ फ़ीसदी तय है। सच बात तो यह है कि देश के लिए भी यह अच्छा है कि अज्ञात संक्रमितों की संख्या में दिन दूनी और रात चौगुनी वृद्धि हो। क्यों, यह समझना आसान है,

1. ये अज्ञात संक्रमित न तो ख़ुद परेशान होते हैं, न किसी और को परेशान करते हैं क्योंकि इनमें कोई लक्षण ही पैदा नहीं होते। इस वजह से इनके लिए न सरकार को अस्पतालों में बेड की व्यवस्था करनी होती है, न वेंटिलेटर की। यानी ये ऐसे कोरोना-संक्रमित हैं, जिनसे सरकार पर कोई दवाब नहीं पड़ता।

2. एक बार कोरोना-संक्रमण होने के बाद शरीर में उससे लड़ने की प्रतिरक्षक क्षमता पैदा हो जाती है। एक मायने में वैक्सीन आने से पहले ही उनको कोरोना का टीका लग गया। इस कारण ये लोग बहुत हद तक कोरोना-संक्रमण से मुक्त हो जाते हैं। इस तरह वे न ख़ुद को बचाते हैं बल्कि औरों को भी बचाते हैं। कैसे, यह अगले पॉइंट में समझते हैं।

3. महामारी विज्ञान में एक सिद्धांत है जिसके अनुसार अगर किसी समाज में बड़ी संख्या में लोग किसी बीमारी से ग्रस्त होकर ठीक हो चुके हों तो उस बीमारी के प्रसार में कमी आती है क्योंकि वायरस को बढ़ने और फैलने के लिए उतने नए शिकार नहीं मिलते, जितने पहले मिल रहे थे। इस सिद्धांत के अनुसार अगर किसी इलाक़े की 60-70 प्रतिशत आबादी संक्रमित हो जाए तो वहां के लोगों में हर्ड इम्यूनिटी पैदा हो जाती है और बीमारी का प्रसार बिल्कुल रुक जाता है।

दिल्ली में हम इस सिद्धांत का असर देख रहे हैं जहां 33 फ़ीसदी आबादी के संक्रमित हो जाने का अनुमान है और हम वहां नए मामलों में कमी देख पा रहे हैं। वही स्थिति अहमदबाद और मुंबई में भी दिख रही है जहां 17 से 25 प्रतिशत लोगों के संक्रमित होने का अंदाज़ा है।

निष्कर्ष यह कि कोरोना-संक्रमितों की संख्या 16 लाख हो जैसा कि सरकार कहती है या 18 करोड़ हो, जैसा कि सीरो सर्वे के आधार पर अनुमान लगाया गया है, हमारे लिए चिंता की कोई बात नहीं है।

 

साभार: सुधीर मिश्रा

 

31-Jul-2020

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