तहसीन मुनव्वर

आजकल एक वायरस का बहुत ज़िक्र हो रहा है। ये चीन से चला है लेकिन हम जिस वायरस की बात कर रहे हैं वो हमारा रात-दिन का चैन छीनने पर तुला है। एक वायरस ने चीन में तीन सौ के क़रीब लोगों को हलाक किया है और तक़रीबन बारह हज़ार के क़रीब लोग इस वायरस के शिकार हैं लेकिन ये जो नफ़रत का कमीना वायरस है इसने दुनिया-भर में लाखों ज़िंदगीयों को अब तक अपना शिकार बनाया है और करोड़ों लोग इस नफ़रत के वायरस की ज़द में आकर अपना घर-बार छोड़ने पर मजबूर हुए हैं और दर-बदरी की ज़िंदगी जी रहे हैं। मगर अफ़सोस तो इस बात का है कि जिस वायरस से करोड़ों लोग प्रभावित हुए हैं और इतिहास गवाह है कि नफ़रत के इस वायरस ने अनगिनत जंगें तक करवाई हैं मगर दुनिया की सभी शांति संस्थाओं की कोशिशों के बावजूद न तो नफ़रत का यह वायरस दुनिया से ख़त्म ही हो पाया है और न ही उसे ख़त्म करने की कोई ऐसी कोशिश की गई है जैसी कि सब कोरोना वायरस के लिए करने की बात कर रहे हैं। एक वायरस के साथ अरबों का हथियारों का बाज़ार जुड़ा है और दूसरे के साथ भी कहीं न कहीं मैडीकल बाज़ार जुड़ ही जाएगा। अब आप फ़ैसला कीजिए कि कौन सा वायरस सबसे ज़्यादा ख़तरनक है। नफ़रत का वायरस या कोरोना वायरस?

नफ़रत के वायरस को दुनिया-भर में फैलाने में अगर ग़ौर करें तो आलमी सियासतदानों का बहुत बड़ा हिस्सा है जो देखने मैं तो अपने अपने देशों में अपनी पकड़ बनाने की ज़िद में दुनिया भर में नफ़रत को बढ़ावा देने में लगे हैं लेकिन उनका असल मक़सद हथियारों की ख़रीद-ओ-फ़रोख्त को ही मज़बूत बनाना है। वो जहां-जहां अमन की खोज में गए हैं उन्हों ने उन मुल्कों को खन्डर बना कर रख दिया है। न ही उन्हें अमन मिला और न ही वो मिला जिसने उन्हें इस मुल्क में बुलाया था। अब वो कुछ देशों से लौटना चाहते हैं तो उन्हें वापसी की राह नहीं मिल रही है और कुछ से उन्हें जाने को कहा जा रहा है तो वो रुकने के बहाने तलाश कर रहे हैं। मगर इस कश्मकश के बीच अगर देखा जाये तो अमन कहीं खो चुका है और नफ़रत का जितना बढ़ावा हो सकता था वो हो चुका है और अब भी नफ़रत के वायरस के फैलने का सिलसिला जारी है। हैरत की बात तो ये है कि नफ़रत इन्सानों को इन्सानों से करना सिखाई जाती है। कभी भी जिहालत से,बेरोज़गारी से,ग़रीबी से,मुसीबतों से, तकलीफों से और इन्सानों को तक़सीम करने वालों से नफ़रत नहीं सिखाता ये नफ़रत का वायरस।

नफ़रत का कमीना वायरस हमको एक दूसरे से नफ़रत करने को कहता है। अपने जैसे गोश्त पोश्त के इन्सान से नफ़रत करने को कहता है। ऐसे इन्सान से नफ़रत करने को कहता है कि जिसको चुटकी भी काटो तो वैसा ही दर्द होता है जैसा कि ख़ुद मुझ को होता है। तो ये नफ़रत का वायरस दुनिया-भर में मौजूद है। ये किसी भी चोले में आजाता है। किसी भी मज़हब और धर्म की आड़ ले सकता है। कभी भाषा के नाम पर, कभी छेत्र के नाम पर,कभी रंग और नसल के नाम पर और कभी मुल्कों के नाम पर ये नफ़रत को विश्व स्तर पर इस तरह बढ़ावा देता है कि आप बैठे होंगे यहां लेकिन आपसे हज़ारों लाखों मील दूर बैठा इन्सान जिसे आप जानते भी नहीं होंगे, जिससे आप ज़िंदगी में कभी मिलेंगे भी नहीं,जिसे आपसे कुछ लेना देना भी नहीं होगा मगर वो आपकी नफ़रत के वायरस के दायरे में आजाता है। नफ़रत का वायरस अपना बीमार बना कर आप को नफ़रत की आग में न सिर्फ झोंक देता है बल्कि वो आपकी बीमारी से कई और नफ़रत के बीमार पैदा कर देता है। कोरोना वायरस से बचने के बहुत से रास्ते हैं मगर नफ़रत के वायरस से बचने का सिर्फ एक ही रास्ता है और वो है मुहब्बत। अगर आप मुहब्बत करना जानते हैं,अपने मज़हब को वाक़ई न सिर्फ समझते हैं बल्कि इस पर चलते भी हैं तब कोई भी माई का लाल आपको नफ़रत के वायरस से बीमार नहीं कर सकता है।
उस दिन जामिया मिल्लिया इस्लामीया में जो नौजवान तमंचा लहराता हुआ घूम रहा था अगर आपको उस से हमदर्दी न हो कर नफ़रत हो रही है तब मुझे माफ़ी के साथ कहना होगा कि आप भी नफ़रत के वायरस के शिकार हो चुके हैं। अफ़सोस की बात तो ये है कि ऐसे बहुत से लोग होंगे जो इस नौजवान की बेवक़ूफ़ी पर तारीफ़ के पुल भी बांध रहे होंगे और अपनी नफ़रत की दुकान चमकाने के लिए उस का सहारा भी लेंगे। ये नौजवान भी नफ़रत का ही शिकार हुआ है। नफ़रत के वायरस ने इस को भी डसा है। ये नफ़रत का वायरस उस को सोशल मीडीया के ज़रीये परोसा गया और वो उस का बीमार होता चला गया। हम लोग जाने अंजाने इस किस्म के काम करने वालों को हीरो बनाने की कोशिश करते हैं और ये नहीं जानते हमारे आस-पास ऐसे कमज़ोर दिमाग़ के लोग मौजूद हैं जो ऐसा करने से हमारे समाज के लिए नासूर बन सकते हैं मगर हम बिना थके नफ़रत के वायरस को बढ़ाने के लिए बोलते चले जाते हैं। ये जाने समझे बग़ैर कि हम कहाँ हैं,हमारा काम किया है, हमें क्या करना था और हम क्या कर रहे हैं? ये सिर्फ एक पेशे की बात नहीं है, हर जगह जब हम अपनी ज़िम्मेदारियों से आँखें मूंदते हैं और जज़बात की रो में बहते हैं तब हम नफ़रत के कमीने वायरस को बढ़ावा देने का काम कर रहे होते हैं मगर इस पर ग़ौर नहीं करते।

कश्मीर में नब्बे की दहाई बहुत ही सख़्त तरीन इमतिहान की रही है। इस दौरान हम वहां पर अपनी सलाहीयत के मुताबिक़ जो मुम्किन था देश के लिए कर रहे थे। उस दौर में हमारे साथ एक साहब थे जो मज़ाक़ में कहते थे कि आप तो सय्यद साहब हैं मेरे हक़ में दुआ कर दीजीए।हम कहते कि हम तो नाम में भी सय्यद नहीं लगाते हैं क्योंकि हम अब वो नहीं रहे। लेकिन उनका सिलसिला नहीं रुकता था। एक दिन मिलिटेंट लीडर शब्बीर शाह की रिहाई लगभग तेरह बरस के बाद हुई और उस का जुलूस जहां हम लोग रह रहे थे उस के सामने से गुज़रा। वो साहब दहश्तगरदों के सताए थे मगर शब्बीर शाह का जुलूस देखने बाहर निकले और उनके चेहरे पर एक इत्मीनान सा नज़र आरहा था। हमने ज़िंदगी में पहली बार बारूद की बू कश्मीर में ही महसूस की थी इस लिए हर किस्म की दहश्तगर्दी से नफ़रत करते हैं। हमने देखा है कि किस तरह कश्मीरी पंडितों ने कश्मीर से आने के बाद अपनी ज़िंदगी की गाड़ी खींची है। किन

 

04-Feb-2020

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